ग़ज़ल
जो वो नज़र-बा-सरे लुत्फ़ आम हो जाये
जो वो नज़र-बा-सरे लुत्फ़ आम हो जायेअजब नहीं कि हमारा भी काम हो जाये
रहीं-ए-यास रहे, पहले आरजू कब तककभी तो आपका दरबार आम हो जाये
सुना है बार सरे बख्शीश है आज पीर मुगांहमें भी काश अता कोई जाम हो जाए
तेरे करम पे है मोकुफ कामरानी-ए-शौकये ना तमामे इलाही तमाम हो जाये
सितम के बाद करम है जफा के बाद अताहमें है बस जो यही इल्तजाम हो जाये
अता हो सोज वो या रब जुनूने हसरत कोकि जिससे पुख्ता यह सौदा-ए-खाम हो जाये
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh