ग़ज़ल
क्या किया मैंने कि इज़हारे-तमन्ना कर दिया
हुस्ने-बेपरवा को ख़ुदबीनओ ख़ुदारा कर दियाक्या किया मैंने कि इज़हारे-तमन्ना कर दिया
बढ़ गयीं तुम से तो मिल कर और भी बेताबियाँहम ये समझे थे कि अब दिल को शकेबा कर दिया
पढ़ के तेरा ख़त मेरे दिल की अजब हालत हुईइज़्तराब-ए-शौक़ ने इक हश्र बरपा कर दिया
हम रहे याँ तक तेरी ख़िदमत में सरगर्मो-नियाज़तुझको आख़िर आश्ना-ए-नाज़-ए-बेजा कर दिया
अब नहीं दिल को किसी सूरत, किसी पहलू क़रारइस निगाहे-नाज़ ने क्या सिह्र ऐसा कर दिया
इश्क़ से तेरे बढ़े क्या-क्या दिलों के मर्तबेमेह्र ज़र्रों को किया क़तरों को दरिया कर दिया
तेरी महफ़िल से उठाता ग़ैर मुझको क्या मजालदेखता था मैं कि तूने भी इशारा कर दिया
सब ग़लत कहते थे लुत्फ़े-यार को वजहे-सकूनदर्दे-दिल इसने तो ‘हसरत’ और दूना कर दिया
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh