ग़ज़ल

मय-ओ-मीना से यारियाँ न गईं

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
मय-ओ-मीना से यारियाँ न गईंमेरी परहेज़गारियाँ न गईं
मर के भी ख़ाके-राहे-यार हुएअपनी उल्फ़त-शुआरियाँ न गईं
अश्कबारी से सोज़े-दिल न मिटाआह की शोलाबारियाँ न गईं
हुस्न की दिलफ़रेबियाँ न घटींइश्क़ की ताज़ाकारियाँ न गईं
सबने छोड़ा तुझे, मगर ’हसरत’दर्द की ग़मगुसारियाँ न गईं
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh