ग़ज़ल
रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम
रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमामदहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम
हैरत गुरूर-ए-हुस्न से शोख़ी से इज़तराबदिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम
अल्लाह रे हुस्न-ए-यार की ख़ूबी के खु़द-ब-खु़दरंगीनियों में डूब गया पैरहन तमाम
देखो तो हुस्न-ए-यार की जादू निगाहियाँबेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम
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