ग़ज़ल

चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद हैहमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बा-हज़ाराँ इज़्तराब-ओ-सद हज़ाराँ इश्तियाक़तुझसे वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है
तुझसे मिलते ही वो बेबाक हो जाना मेराऔर तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है
खेंच लेना वोह मेरा परदे का कोना दफ़तनऔर दुपट्टे से तेरा वो मुँह छुपाना याद है
जानकार सोता तुझे वो क़स्दे पा-बोसी मेराऔर तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कराना याद है
तुझको जब तन्हा कभी पाना तो अज़ राहे-लिहाज़हाले दिल बातों ही बातों में जताना याद है
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न थासच कहो क्या तुमको भी वो कारख़ाना याद है
ग़ैर की नज़रों से बच कर सबकी मरज़ी के ख़िलाफ़वो तेरा चोरी छिपे रातों को आना याद है
आ गया गर बस्ल की शब भी कहीं ज़िक्रे-फ़िराक़वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिएवो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
देखना मुझको जो बरगशता तो सौ-सौ नाज़ सेजब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है
चोरी-चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगहमुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
बावजूदे-इद्दआ-ए-इत्तिक़ा ‘हसरत’ मुझेआज तक अहद-ए-हवस का वो ज़माना याद है
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