ग़ज़ल
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैंइलाही तर्के-उल्फ़त पर वो क्योंकर याद आते हैं
न छेड़ ऐ हम नशीं कैफ़ीयते-सहबा के अफ़सानेशराबे-बेख़ुदी के मुझको साग़र याद आते हैं
रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाये नाकामीवो दश्ते-ख़ुद फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं
नहीं आती तो याद उनकी महीनों भर नहीं आतीमगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
हक़ीक़त खुल गई ‘हसरत’ तेरे तर्के-महब्बत कीतुझे तो अब वो पहले से भी बढ़कर याद आते हैं
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