ग़ज़ल
कैसे छुपाऊँ राज़-ए-गम दीदा-ए-तर को क्या करूँ
कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म दीदा-ए-तर को क्या करूँ.दिल की तपिश को क्या करूँ सोज़-ए-जिगर को क्या करूँ.
शोरिश-ए-आशिक़ी कहाँ और मेरी सादगी कहाँहुस्न को तेरे क्या कहूँ अपनी नज़र को क्या करूँ.
ग़म का न दिल में हो गुज़र, वस्ल की शब हो यूँ बसरसब ये क़ुबूल है मगर ख़ौफ़-ए-सहर को क्या करूँ.
हाल मेरा था जब बुरा तब न हुई तुम्हें खबरबाद मेरे हुआ असर अब मैं असर को क्या करूँ.
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