ग़ज़ल

घिर के आख़िर आज बरसी है घटा बरसात की

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
घिर के आख़िर आज बरसी है घटा बरसात कीमैकदों में कब से होती थी दुआ बरसात की
मूजब-ए-सोज़-ओ- सुरूर-ओ-बायस-ए-ऐश-ओ-निशातताज़गी बख़्श-ए-दिल-ओ-जाँ है हवा बरसात की
शाम-ए-सर्मा दिलरुबा था, सुबह-ए-गर्मा ख़ुशनुमादिलरुबा तर, खुशनुमा तर है फ़ज़ा बरसात की
गर्मी-ओ-सर्दी के मिट जाते हैं सब जिससे मर्ज़लाल लाल एक ऐसी निकली है दवा बरसात की
सुर्ख़ पोशिश पर है ज़र्द-ओ-सब्ज़ बूटों की बहारक्यों न हों रंगीनियाँ तुझपर फ़िदा बरसात की
देखने वाले हुए जाते हैं पामाल-ए-हवसदेखकर छब तेरी ऐ रंगीं अदा बरसात की
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