ग़ज़ल
जीवन का दिन बीत चुका था छाई थी जीवन की रात
[सुभाष बोस के प्रति]
जीवन का दिन बीत चुका था,छाई थी जीवन की रात,किंतु नहीं मैंने छोड़ी थीआशा-होगा पुनः प्रभात।
काल न ठंडी कर पाया था,मेरे वक्षस्थल की आग,तोम तिमिर के प्रति विद्रोहीबन उठता हर एक चिराग़।
मेरे आँगन के अंदर भी,जल-जलकर प्राणों के दीप,मुझ से यह कहते रहते थे,"मां, है प्रातःकाल समीप!"
किंतु प्रतीक्षा करते हाराएक दिया नन्हा-नादान,बोला, "मां, जाता मैं लानेसूरज को धर उसके कान!"
औ’ मेरा वह वातुल, चंचलमेरा वह नटखट नादान,मेरे आँगन को कर सूनाहाय, हो गया अंतर्धान।
और, नियति की चाल अनोखी,आया फिर ऐसा तूफ़ान,जिसने कर डाला कितने हीमेरे दीपों का अवसान।
हर बल अपने को बिखराकर,होता शांत, सभी को ज्ञात,मंद पवन में ही परिवर्तितहो जाता हर झंझावात।
औ’, अपने आँगन के दीपोंको फिर आज रही मैं जोड़,अडिग जिन्होंने रहकर ली थीभीषण झंझानिल से होड़।
बिछुड़े दीपक फिर मिलते हैं,मिलकर मोद मनाते हैं,किसने क्या झेला, क्या भोगाआपस में बतलाते हैं।
किन्तु नहीं लौटा है अब तकमेरा वह भोला, अनजानदीप गया था जो प्राची कोलाने मेरा स्वर्ण विहान।
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