ग़ज़ल
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?
मैं दुखी जब-जब हुआसंवेदना तुमने दिखाई,मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,रीति दोनो ने निभाई,किन्तु इस आभार का अबहो उठा है बोझ भारी;क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?
एक भी उच्छ्वास मेराहो सका किस दिन तुम्हारा?उस नयन से बह सकी कबइस नयन की अश्रु-धारा?सत्य को मूंदे रहेगीशब्द की कब तक पिटारी?क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?
कौन है जो दूसरों कोदु:ख अपना दे सकेगा?कौन है जो दूसरे सेदु:ख उसका ले सकेगा?क्यों हमारे बीच धोखेका रहे व्यापार जारी?क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?
क्यों न हम लें मान, हम हैंचल रहे ऐसी डगर पर,हर पथिक जिस पर अकेला,दुख नहीं बँटते परस्पर,दूसरों की वेदना मेंवेदना जो है दिखाता,वेदना से मुक्ति का निजहर्ष केवल वह छिपाता;तुम दुखी हो तो सुखी मैंविश्व का अभिशाप भारी!क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?क्या करूँ?
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