ग़ज़ल

कवि की वासना

हरिवंशराय बच्चन · सब कलाम देखें
कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
सृष्टि के प्रारंभ मेंमैने उषा के गाल चूमे,बाल रवि के भाग्य वालेदीप्त भाल विशाल चूमे,प्रथम संध्या के अरुण दृगचूम कर मैने सुला‌ए,तारिका-कलि से सुसज्जितनव निशा के बाल चूमे,वायु के रसमय अधरपहले सके छू होठ मेरेमृत्तिका की पुतलियो सेआज क्या अभिसार मेरा?कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
विगत-बाल्य वसुंधरा केउच्च तुंग-उरोज उभरे,तरु उगे हरिताभ पट धरकाम के धव्ज मत्त फहरे,चपल उच्छृंखल करों नेजो किया उत्पात उस दिन,है हथेली पर लिखा वह,पढ़ भले ही विश्व हहरे;प्यास वारिधि से बुझाकरभी रहा अतृप्त हूँ मैं,कामिनी के कंच-कलश सेआज कैसा प्यार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
इन्द्रधनु पर शीश धरकरबादलों की सेज सुखकरसो चुका हूँ नींद भर मैंचंचला को बाहों में भर,दीप रवि-शशि-तारकों नेबाहरी कुछ केलि देखी,देख, पर, पाया न को‌ईस्वप्न वे सुकुमार सुंदरजो पलक पर कर निछावरथी ग‌ई मधु यामिनी वह;यह समाधि बनी हु‌ई हैयह न शयनागार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
आज मिट्टी से घिरा हूँपर उमंगें हैं पुरानी,सोमरस जो पी चुका हैआज उसके हाथ पानी,होठ प्यालों पर टिके तोथे विवश इसके लिये वे,प्यास का व्रत धार बैठा;आज है मन, किन्तु मानी;मैं नहीं हूँ देह-धर्मों सेबिधा, जग, जान ले तू,तन विकृत हो जाये लेकिनमन सदा अविकार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
निष्परिश्रम छोड़ जिनकोमोह लेता विश्व भर को,मानवों को, सुर-असुर को,वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को,भंग कर देता तपस्यासिद्ध, ऋषि, मुनि सत्तमों कीवे सुमन के बाण मैंने,ही दिये थे पंचशर को;शक्ति रख कुछ पास अपनेही दिया यह दान मैंने,जीत पा‌एगा इन्हीं सेआज क्या मन मार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
प्राण प्राणों से सकें मिलकिस तरह, दीवार है तन,काल है घड़ियां न गिनता,बेड़ियों का शब्द झन-झनवेद-लोकाचार प्रहरीताकते हर चाल मेरी,बद्ध इस वातावरण मेंक्या करे अभिलाष यौवन!अल्पतम इच्छा यहांमेरी बनी बंदी पड़ी है,विश्व क्रीडास्थल नहीं रेविश्व कारागार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
थी तृषा जब शीत जल कीखा लिये अंगार मैंने,चीथड़ों से उस दिवस थाकर लिया श्रृंगार मैंनेराजसी पट पहनने कोजब हु‌ई इच्छा प्रबल थी,चाह-संचय में लुटायाथा भरा भंडार मैंने;वासना जब तीव्रतम थीबन गया था संयमी मैं,है रही मेरी क्षुधा हीसर्वदा आहार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
कल छिड़ी, होगी ख़तम कलप्रेम की मेरी कहानी,कौन हूँ मैं, जो रहेगीविश्व में मेरी निशानी?क्या किया मैंने नही जोकर चुका संसार अबतक?वृद्ध जग को क्यों अखरतीहै क्षणिक मेरी जवानी?मैं छिपाना जानता तोजग मुझे साधू समझता,शत्रु मेरा बन गया हैछल-रहित व्यवहार मेरा!कह रहा जग वासनामयहो रहा उद्गार मेरा!
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh