ग़ज़ल
काला कौआ
उजला-उजला हंस एक दिनउड़ते-उड़ते आया,हंस देखकर काला कौआमन ही मन शरमाया।
लगा सोचने उजला-उजलामैं कैसे हो पाऊँ-उजला हो सकता हूँसाबुन से मैं अगर नहाऊँ।
यही सोचता मेरे घ्ज्ञर परआया काला कागा,और गुसलखाने से मेरासाबुन लेकर भागा।
फिर जाकर गड़ही पर उसनेसाबुन खूब लगाया,खूब नहाया, मगर न अपनाकालापन धो पाया।
मिटा न उसका कालापन तोमन ही मन पछताया,पास हंस के कभी न फिर वहकाला कौआ आया।
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