ग़ज़ल
कौन मिलनातुर नहीं है ?
आक्षितिज फैली हुई मिट्टी निरन्तर पूछती है,कब कटेगा, बोल, तेरी चेतना का शाप,और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा शान्त ?कौन मिलनातुर नहीं है ?
गगन की निर्बन्ध बहती वायु प्रति पल पूछती है,कब गिरेगी, टूट, तेरी देह की दीवार,और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा मुक्त ?कौन मिलनातुर नहीं है ?
सर्व व्यापी विश्व का व्यक्तित्व प्रति क्षण पूछता है,कब मिटेगा, बोल, तेरे अहं का अभिमान,और तू हों लीन मुझमे फिर बनेगा पूर्ण ?कौन मिलनातुर नहीं है ?
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