ग़ज़ल
जुगनू
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
::उठी ऐसी घटा नभ में::छिपे सब चांद औ' तारे,::उठा तूफान वह नभ में::गए बुझ दीप भी सारे,मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है?अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
::गगन में गर्व से उठउठ,::गगन में गर्व से घिरघिर,::गरज कहती घटाएँ हैं,::नहीं होगा उजाला फिर,मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाए कौन बैठा है?अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
::तिमिर के राज का ऐसा::कठिन आतंक छाया है,::उठा जो शीश सकते थे::उन्होनें सिर झुकाया है,मगर विद्रोह की ज्वाला जलाए कौन बैठा है?अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
::प्रलय का सब समां बांधे::प्रलय की रात है छाई,::विनाशक शक्तियों की इस::तिमिर के बीच बन आई,मगर निर्माण में आशा दृढ़ाए कौन बैठा है?अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
::प्रभंजन, मेघ दामिनी ने::न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,::धरा के और नभ के बीच::कुछ साबित नहीं छोड़ा,मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है?अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
::प्रलय की रात में सोचे::प्रणय की बात क्या कोई,::मगर पड़ प्रेम बंधन में::समझ किसने नहीं खोई,किसी के पथ में पलकें बिछाए कौन बैठा है?अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
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