ग़ज़ल

आज तुम मेरे लिये हो

हरिवंशराय बच्चन · सब कलाम देखें
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।
मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए होप्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो ।
रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,आज आधे विश्व से अभिसार मेरा,तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए होप्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
वह सुरा के रूप से मोहे भला क्या,वह सुधा के स्वाद से जा‌ए छला क्या,जो तुम्हारे होंठ का मधु-विष पिए होप्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
मृत-सजीवन था तुम्हारा तो परस ही,पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए होप्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh