ग़ज़ल

उस पार न जाने क्या होगा

हरिवंशराय बच्चन · सब कलाम देखें
इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!यह चाँद उदित होकर नभ मेंकुछ ताप मिटाता जीवन का,लहरा लहरा यह शाखाएँकुछ शोक भुला देती मन का,कल मुर्झानेवाली कलियाँहँसकर कहती हैं मगन रहो,बुलबुल तरु की फुनगी पर सेसंदेश सुनाती यौवन का,तुम देकर मदिरा के प्यालेमेरा मन बहला देती हो,उस पार मुझे बहलाने काउपचार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
जग में रस की नदियाँ बहती,रसना दो बूंदें पाती है,जीवन की झिलमिल सी झाँकीनयनों के आगे आती है,स्वर तालमयी वीणा बजती,मिलती है बस झंकार मुझे,मेरे सुमनों की गंध कहींयह वायु उड़ा ले जाती है;ऐसा सुनता, उस पार, प्रिये,ये साधन भी छिन जाएँगे;तब मानव की चेतनता काआधार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
प्याला है पर पी पाएँगे,है ज्ञात नहीं इतना हमको,इस पार नियति ने भेजा है,असमर्थबना कितना हमको,कहने वाले, पर कहते है,हम कर्मों में स्वाधीन सदा,करने वालों की पर-वशताहै ज्ञात किसे, जितनी हमको?कह तो सकते हैं, कहकर हीकुछ दिल हलका कर लेते हैं,उस पार अभागे मानव काअधिकार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
कुछ भी न किया था जब उसका,उसने पथ में काँटे बोये,वे भार दिए धर कंधों पर,जो रो-रोकर हमने ढोए;महलों के सपनों के भीतरजर्जर खँडहर का सत्य भरा,उर में ऐसी हलचल भर दी,दो रात न हम सुख से सोए;अब तो हम अपने जीवन भरउस क्रूर कठिन को कोस चुके;उस पार नियति का मानव सेव्यवहार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
संसृति के जीवन में, सुभगेऐसी भी घड़ियाँ आएँगी,जब दिनकर की तमहर किरणेतम के अन्दर छिप जाएँगी,जब निज प्रियतम का शव, रजनीतम की चादर से ढक देगी,तब रवि-शशि-पोषित यह पृथ्वीकितने दिन खैर मनाएगी!जब इस लंबे-चौड़े जग काअस्तित्व न रहने पाएगा,तब हम दोनो का नन्हा-सासंसार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
ऐसा चिर पतझड़ आएगाकोयल न कुहुक फिर पाएगी,बुलबुल न अंधेरे में गा गाजीवन की ज्योति जगाएगी,अगणित मृदु-नव पल्लव के स्वर‘मरमर’ न सुने फिर जाएँगे,अलि-अवली कलि-दल पर गुंजनकरने के हेतु न आएगी,जब इतनी रसमय ध्वनियों काअवसान, प्रिये, हो जाएगा,तब शुष्क हमारे कंठों काउद्गार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
सुन काल प्रबल का गुरु-गर्जननिर्झरिणी भूलेगी नर्तन,निर्झर भूलेगा निज ‘टलमल’,सरिता अपना ‘कलकल’ गायन,वह गायक-नायक सिन्धु कहीं,चुप हो छिप जाना चाहेगा,मुँह खोल खड़े रह जाएँगेगंधर्व, अप्सरा, किन्नरगण;संगीत सजीव हुआ जिनमें,जब मौन वही हो जाएँगे,तब, प्राण, तुम्हारी तंत्री काजड़ तार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
उतरे इन आखों के आगेजो हार चमेली ने पहने,वह छीन रहा, देखो, माली,सुकुमार लताओं के गहने,दो दिन में खींची जाएगीऊषा की साड़ी सिन्दूरी,पट इन्द्रधनुष का सतरंगापाएगा कितने दिन रहने;जब मूर्तिमती सत्ताओं कीशोभा-सुषमा लुट जाएगी,तब कवि के कल्पित स्वप्नों काश्रृंगार न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
दृग देख जहाँ तक पाते हैं,तम का सागर लहराता है,फिर भी उस पार खड़ा कोईहम सब को खींच बुलाता है;मैं आज चला तुम आओगीकल, परसों सब संगी-साथी,दुनिया रोती-धोती रहती,जिसको जाना है, जाता है;मेरा तो होता मन डगडग,तट पर ही के हलकोरों से!जब मैं एकाकी पहुँचूँगामँझधार, न जाने क्या होगा!इस पार, प्रिये मधु है तुम हो,उस पार न जाने क्या होगा!
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