ग़ज़ल

कर्मवीर

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' · सब कलाम देखें
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहींरह भरोसे भाग्य के दुख भोग पछताते नहींकाम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहींभीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहींहो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भलेसब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।
आज करना है जिसे करते उसे हैं आज हीसोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वहीमानते जी की हैं, सुनते हैं सदा सबकी कहीजो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप हीभूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहींकौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं ।
जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहींकाम करने की जगह बातें बनाते हैं नहींआज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहींयत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहींबात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिएवे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए ।
व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखरवे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहरगर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहरआग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपटये कँपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहींभूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.