ग़ज़ल
आदर्श
लोक को रुलाता जो था राम ने रुलाया उसेहम खल खलता के खले हैं कलपते।काँपता भुवन का कँपाने वाला उन्हें देखहम हैं बिलोक बल-वाले को बिलपते।हरिऔधा वे थे ताप-दाता ताप-दायकों केहम नित नये ताप से हैं आप तपते।रोम रोम में जो राम-काम रमता है नहींनाम के लिए तो राम नाम क्या हैं जपते।1।
पाँव छू छू उनके तरे हैं छितितल पापीऔर हम छाँह से अछूत की हैं डरते।बड़े बड़े दानव दलित उनसे हैं हुएदब दब दानवों से हम हैं उबरते।हरिऔधा वे हैं अकलंक सकलंक हो केहम भाल-अंक को कलंक से हैं भरते।जो न रमे राम में हैं कहें तो न राम रामलीला में न लीन हैं तो लीला क्यों हैं करते।2।
हो के बनबासी गिरिबासी को तिलक सारासाहस से पाया कपि-सेना का सहारा है।बन खरदूषण तिमिर को प्रखर-रविअंकले अनेक-दानवी-दल विदारा है।हरिऔधा राम की ललाम-लीला भूले नहींसविधि उन्होंने बाँधी वारि-निधि-धारा है।दो ही बाहु द्वारा बीस बाहु का उतारा मदहोते एक आनन दशानन को मारा है।3।
पातक-निकंदन के पदकंज पूज पूजकैसे पाँव पातक पगों के सहलावेंगे।दानव-दलन से जो लगन रहेगी लगीदानव दुरन्त कैसे दिल दहलावेंगे।हरिऔधा कैसे बहकावेंगे बहक बैरीप्रभु के प्रलंब बाहु यदि बहलावेंगे।एक रक्त होते हम होवेंगे विभक्त कैसेभूरि भक्ति से जो रामभक्त कहलावेंगे।4।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.