ग़ज़ल

कमनीय कामनाएँ

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' · सब कलाम देखें
वर-विवेक कर दान सकल-अविवेक निवारे।दूर करे अविनार सुचारु विचार प्रचारे।सहज-सुतति को बितर कुमति-कालिमा नसावे।करे कुरुचि को विफल सुरुचि को सफल बनावे।भावुक-मन-सुभवन में रहे प्रतिभा-प्रभा पसारती।भव-अनुपम-भावों से भरित भारत-भूतल-भारती।1।
प्यारी न्यारी प्रभु-पद-रता कान्त चिन्ता उपेता।पाई जावे परम-मधुरा मानवी-प्रीति पूता।सद्भावों से विलस सरसे सारभूता दिखावे।होवे सारे रुचिर रस से सिक्त साहित्य सत्ता।2।
कुफल 'फूल' कदापि न दे सकें।फल भले फल कामुक को मिलें।विफलता विफला बनती रहे।सफलता कृति को सफला करे।3।
नयन हों हित अंजन से अंजे।विनय हो मन मधय विराजती।रत रहें जन-रंजन में सदा।रुचि रहे जगतीतल रंजिनी।4।
मधुरिमा-मय हो बचनावली।बहु मनोहर भाव समूह हों।हृदय में बिलसे हितकारिता।भरित मानवता मन में रहे।5।
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