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दोहावली

गोस्वामी तुलसीदास · सब कलाम देखें
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार॥
नाम राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥
मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।पालै पोषै सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
तुलसी साथी बिपति के बिद्या बिनय बिबेक।साहस सुकृति सुसत्यब्रत राम भरोसो एक॥
तुलसी पावस के समै धरी कोकिलन मौन।अब तो दादुर बोलिहैं हमें पूछिहै कौन॥