ग़ज़ल

धनुर्धर राम

गोस्वामी तुलसीदास · सब कलाम देखें
सुभग सरासन सायक जोरे॥खेलत राम फिरत मृगया बन, बसति सो मृदु मूरति मन मोरे॥पीत बसन कटि, चारू चारि सर, चलत कोटि नट सो तृन तोरे।स्यामल तनु स्रम-कन राजत ज्यौं, नव घन सुधा सरोवर खोरे॥ललित कंठ, बर भुज, बिसाल उर, लेहि कंठ रेखैं चित चोरे॥अवलोकत मुख देत परम सुख, लेत सरद-ससि की छबि छोरे॥जटा मुकुट सिर सारस-नयनि, गौहैं तकत सुभोह सकोरे॥सोभा अमित समाति न कानन, उमगि चली चहुँ दिसि मिति फोरे॥चितवन चकित कुरंग कुरंगिनी, सब भए मगन मदन के भोरे॥तुलसीदास प्रभु बान न मोचत, सहज सुभाय प्रेमबस थोरे॥
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