ग़ज़ल
मनोहरताको मानो ऐन
मनोहरताको मानो ऐन।स्यामल गौर किसोर पथिक दोउ सुमुखि! निरखि भरि नैन॥बीच बधू बिधु-बदनि बिराजत उपमा कहुँ कोऊ है न।मानहुँ रति ऋतुनाथ सहित मुनि बेष बनाए है मैन॥किधौं सिंगार-सुखमा सुप्रेम मिलि चले जग-जित-बित लैन।अद्भुत त्रयी किधौं पठई है बिधि मग-लोगन्हि सुख दैन॥सुनि सुचि सरल सनेह सुहावने ग्राम-बधुन्हके बैन।तुलसी प्रभु तरुतर बिलँबे किए प्रेम कनौडे कै न ?
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh