ग़ज़ल
कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति
कब देखौंगी नयन वह मधुर मूरति ?राजिवदल-नयन, कोमल-कृपा-अयन,मयननि बहु छबि अंगनि दूरति॥१॥सिरसि जटाकलाप पानि सायक चापउरसि रुचिर बनमाल मूरति।तुलसीदास रघुबीरकी सोभा सुमिरि,भई है मगन नहिं तनकी सूरति॥२॥
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