ग़ज़ल

एसी मूढता या मन की

गोस्वामी तुलसीदास · सब कलाम देखें
एसी मूढता या मन की।परिहरि रामभगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की।धूम समूह निरखि-चातक ज्यौं, तृषित जानि मति धन की।नहिं तहं सीतलता न बारि, पुनि हानि होति लोचन की।ज्यौं गज काँच बिलोकि सेन जड़ छांह आपने तन की।टूटत अति आतुर अहार बस, छति बिसारि आनन की।कहं लौ कहौ कुचाल कृपानिधि, जानत हों गति मन की।तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निज पन की।
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