ग़ज़ल
जानकी जीवन की बलि जैहों
जानकी जीवन की बलि जैहों।चित कहै, राम सीय पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहों॥१॥उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-बिमुख न पैहों।मन समेत या तनुके बासिन्ह, इहै सिखावन दैहों॥२॥स्त्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहों।रोकिहौं नैन बिलोकत औरहिं सीस ईसही नैहों॥३॥नातो नेह नाथसों करि सब नातो नेह बहैहों।यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहों॥४॥
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