ग़ज़ल
कुछ ऐसा खेल रचो साथी
कुछ ऐसा खेल रचो साथी!कुछ जीने का आनंद मिलेकुछ मरने का आनंद मिलेदुनिया के सूने आँगन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
वह मरघट का सन्नाटा तो रह-रह कर काटे जाता हैदुःख दर्द तबाही से दबकर, मुफ़लिस का दिल चिल्लाता हैयह झूठा सन्नाटा टूटेपापों का भरा घड़ा फूटेतुम ज़ंजीरों की झनझन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
यह उपदेशों का संचित रस तो फीका-फीका लगता हैसुन धर्म-कर्म की ये बातें दिल में अंगार सुलगता हैचाहे यह दुनिया जल जाएमानव का रूप बदल जाएतुम आज जवानी के क्षण में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
यह दुनिया सिर्फ सफलता का उत्साहित क्रीड़ा-कलरव हैयह जीवन केवल जीतों का मोहक मतवाला उत्सव हैतुम भी चेतो मेरे साथीतुम भी जीतो मेरे साथीसंघर्षों के निष्ठुर रण में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
जीवन की चंचल धारा में, जो धर्म बहे बह जाने दोमरघट की राखों में लिपटी, जो लाश रहे रह जाने दोकुछ आँधी-अंधड़ आने दोकुछ और बवंडर लाने दोनवजीवन में नवयौवन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
जीवन तो वैसे सबका है, तुम जीवन का शृंगार बनोइतिहास तुम्हारा राख बना, तुम राखों में अंगार बनोअय्याश जवानी होती हैगत-वयस कहानी होती हैतुम अपने सहज लड़कपन में, कुछ ऐसा खेल रचो साथी !
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