ग़ज़ल
मेरा धन है स्वाधीन क़लम
राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लमजिसने तलवार शिवा को दीरोशनी उधार दिवा को दीपतवार थमा दी लहरों कोखंजर की धार हवा को दीअग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लम
रस-गंगा लहरा देती हैमस्ती-ध्वज फहरा देती हैचालीस करोड़ों की भोलीकिस्मत पर पहरा देती हैसंग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लम
कोई जनता को क्या लूटेकोई दुखियों पर क्या टूटेकोई भी लाख प्रचार करेसच्चा बनकर झूठे-झूठेअनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लम
बस मेरे पास हृदय-भर हैयह भी जग को न्योछावर हैलिखता हूँ तो मेरे आगेसारा ब्रह्मांड विषय-भर हैरँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन क़लममेरा धन है स्वाधीन कलम
लिखता हूँ अपनी मर्ज़ी सेबचता हूँ कैंची-दर्ज़ी सेआदत न रही कुछ लिखने कीनिंदा-वंदन खुदगर्ज़ी सेकोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लम
तुझ-सा लहरों में बह लेतातो मैं भी सत्ता गह लेताईमान बेचता चलता तोमैं भी महलों में रह लेताहर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन क़लममेरा धन है स्वाधीन क़लम
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.