ग़ज़ल

अपनेपन का मतवाला

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
अपनेपन का मतवाला था भीड़ों में भी मैंखो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सका
देखा जग ने टोपी बदलीतो मन बदला, महिमा बदलीपर ध्वजा बदलने से न यहाँमन-मंदिर की प्रतिमा बदली
मेरे नयनों का श्याम रंग जीवन भर कोईधो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सका
हड़ताल, जुलूस, सभा, भाषणचल दिए तमाशे बन-बनकेपलकों की शीतल छाया मेंमैं पुनः चला मन का बन के
जो चाहा करता चला सदा प्रस्तावों को मैंढो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सका
दीवारों के प्रस्तावक थेपर दीवारों से घिरते थेव्यापारी की ज़ंजीरों सेआज़ाद बने वे फिरते थे
ऐसों से घिरा जनम भर मैं सुखशय्या पर भीसो न सकाचाहे जिस दल में मिल जाऊँ इतना सस्तामैं हो न सका
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.