ग़ज़ल

तू चिंगारी बनकर उड़ री

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूँ,तू बन जा हहराती गँगा, मैं झेलम बेहाल बनूँ,आज बसन्ती चोला तेरा, मैं भी सज लूँ लाल बनूँ,तू भगिनी बन क्रान्ति कराली, मैं भाई विकराल बनूँ,यहाँ न कोई राधारानी, वृन्दावन, बंशीवाला,तू आँगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला ।
बहन प्रेम का पुतला हूँ मैं, तू ममता की गोद बनी,मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी,मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,भाई की गति, मति भगिनी की दोनों मंगल-मोद बनीयह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना ।जननी की जंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना ।
भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,संगम है, गँगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है,यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है,पागल घडी, बहन-भाई है, वह आज़ाद तराना है ।मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है ।
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