ग़ज़ल

हिंदी है भारत की बोली

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
दो वर्तमान का सत्‍य सरल,सुंदर भविष्‍य के सपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
यह दुखड़ों का जंजाल नहीं,लाखों मुखड़ों की भाषा हैथी अमर शहीदों की आशा,अब जिंदों की अभिलाषा हैमेवा है इसकी सेवा में,नयनों को कभी न झंपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
क्‍यों काट रहे पर पंछी के,पहुंची न अभी यह गांवों तकक्‍यों रखते हो सीमित इसकोतुम सदियों से प्रस्‍तावों तकऔरों की भिक्षा से पहले,तुम इसे सहारे अपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
श्रृंगार न होगा भाषण सेसत्‍कार न होगा शासन सेयह सरस्‍वती है जनता कीपूजो, उतरो सिंहासन सेइसे शांति में खिलने दोसंघर्ष-काल में तपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
जो युग-युग में रह गए अड़ेमत उन्‍हीं अक्षरों को काटोयह जंगली झाड़ न, भाषा है,मत हाथ पांव इसके छांटोअपनी झोली से कुछ न लुटेऔरों का इसमें खपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो आपने आप पनपने दो
इसमें मस्‍ती पंजाबी की,गुजराती की है कथा मधुररसधार देववाणी की है,मंजुल बंगला की व्‍यथा मधुरसाहित्‍य फलेगा फूलेगापहले पीड़ा से कंपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो आपने आप पनपने दो
नादान नहीं थे हरिश्‍चंद्र,मतिराम नहीं थे बुद्ध‍िहीनजो कलम चला कर हिंदी मेंरचना करते थे नित नवीनइस भाषा में हर ‘मीरा’ कोमोहन की माल जपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
प्रतिभा हो तो कुछ सृष्‍ट‍ि करोसदियों की बनी बिगाड़ो मतकवि सूर बिहारी तुलसी कायह बिरुवा नरम उखाड़ो मतभंडार भरो, जनमन कीहर हलचल पुस्‍तक में छपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
मृदु भावों से हो हृदय भरातो गीत कलम से फूटेगाजिसका घर सूना-सूना होवह अक्षर पर ही टूटेगाअधिकार न छीनो मानस कावाणी के लिए कलपने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
बढ़ने दो इसे सदा आगेहिंदी जनमत की गंगा हैयह माध्‍यम उस स्‍वाधीन देश काजिसकी ध्‍वजा तिरंगा हैहों कान पवित्र इसी सुर मेंइसमें ही हृदय तड़पने दोहिंदी है भारत की बोलीतो अपने आप पनपने दो
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