ग़ज़ल
नवीन कल्पना करो
निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिएतुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो,तुम कल्पना करो।
अब देश है स्वतंत्र, मेदिनी स्वतंत्र हैमधुमास है स्वतंत्र, चाँदनी स्वतंत्र हैहर दीप है स्वतंत्र, रोशनी स्वतंत्र हैअब शक्ति की ज्वलंत दामिनी स्वतंत्र है
लेकर अनंत शक्तियाँ सद्य समृद्धि की-तुम कामना करो, किशोर कामना करो,तुम कल्पना करो।
तन की स्वतंत्रता चरित्र का निखार हैमन की स्वतंत्रता विचार की बहार हैघर की स्वतंत्रता समाज का सिंगार हैपर देश की स्वतंत्रता अमर पुकार है
टूटे कभी न तार यह अमर पुकार का-तुम साधना करो, अनंत साधना करो,तुम कल्पना करो।
हम थे अभी-अभी गुलाम, यह न भूलनाकरना पड़ा हमें सलाम, यह न भूलनारोते फिरे उमर तमाम, यह न भूलनाथा फूट का मिला इनाम, वह न भूलना
बीती गुलामियाँ, न लौट आएँ फिर कभीतुम भावना करो, स्वतंत्र भावना करोतुम कल्पना करो।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.