ग़ज़ल
आ रहे तुम बनकर मधुमास
आ रहे तुम बन कर मधुमासऔर मैं ऋतु का पहला फूल
घने तुम काले-काले मेघ उठेहो आज बाँच कर दुन्दऔर मैं उठा पवन से सिहरथिरकता धारों पर जल बुन्दबने तुम गगन गगन मुख चन्द्रचंद्र की किरण रेशमी डोरऔर मैं तुम्हें देखने बना मुग्धदो नयन-नयन की कोरसबल तुम आगे बढ़ते चरणऔर मैं पीछे पड़ती धूल
तरुण तुम अरुण किरण का वाणकठिन मैं अन्धकार का मर्ममधुर तुम मधुपों की गुंजार औरमैं खिली कली की शर्मदूर की तुम धीमी आवाज़गूँजती जो जग के इस पाररात की मैं हूँ टूटी नींदनींद का बिखर गया संसारचपल तुम बढ़ती आती लहरऔर मैं डूब गया उपकूल
सुभग तुम झिलमिल-झिलमिल प्रातःप्रातः का मन्द मधुर कलहासगहन मैं थकी झुटपुटी साँझउतरती तरु कुंजों के पाससघन तुम हरा-भरा वन कुञ्जकुञ्ज का मैं गायक खल बालतुम्हारा जीवन मेरा गानऔर मेरा जीवन तरु डालपुरुष तुम फैला देते बाँहप्रकृति मैं जाती उन पर झूल
प्रवल तुम तेज पवन की फूँकफूँक से उठा हुआ तूफ़ानऔर मैं थरथर कम्पित दीपदीप से झाँक रहा निर्वाणकुशल तुम कवि कुल कण्ठाभरणऔर मैं एक तुम्हारा छन्द
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.