ग़ज़ल
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँतू चलती है पन्ने-पन्ने, मैं लोचन-लोचन बढ़ता हूँ
मै खुली क़लम का जादूगर, तू बंद क़िताब कहानी कीमैं हँसी-ख़ुशी का सौदागर, तू रात हसीन जवानी कीतू श्याम नयन से देखे तो, मैं नील गगन में उड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तू मन के भाव मिलाती है, मेरी कविता के भावों सेमैं अपने भाव मिलाता हूँ, तेरी पलकों की छाँवों सेतू मेरी बात पकड़ती है, मैं तेरा मौन पकड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तू पृष्ठ-पृष्ठ से खेल रही, मैं पृष्ठों से आगे-आगेतू व्यर्थ अर्थ में उलझ रही, मेरी चुप्पी उत्तर माँगेतू ढाल बनाती पुस्तक को, मैं अपने मन से लड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तू छंदों के द्वारा जाने, मेरी उमंग के रंग-ढंगमैं तेरी आँखों से देखूँ, अपने भविष्य का रूप-रंगतू मन-मन मुझे बुलाती है, मैं नयना-नयना मुड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
मेरी कविता के दर्पण में, जो कुछ है तेरी परछाईंकोने में मेरा नाम छपा, तू सारी पुस्तक में छाईदेवता समझती तू मुझको, मैं तेरे पैयां पड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तेरी बातों की रिमझिम से, कानों में मिसरी घुलती हैमेरी तो पुस्तक बंद हुई, अब तेरी पुस्तक खुलती हैतू मेरे जीवन में आई, मैं जग से आज बिछड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
मेरे जीवन में फूल-फूल, तेरे मन में कलियाँ-कलियाँरेशमी शरम में सिमट चलीं, रंगीन रात की रंगरलियाँचंदा डूबे, सूरज डूबे, प्राणों से प्यार जकड़ता हूँतू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
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