ग़ज़ल
युगांतर
अरे युगांतर, आ जल्दी अब खोल, खोल मेरा बंधनबंधा हुआ इन जंजीरों से तड़प रहा कब से जीवनदेख, कटी पाँखें कैंची से उड़ सकता न जरा भी मनभरा कान, पाँव है लंगड़ा, अँधा बना हुआ लोचनले जा यह तन ऐसा जीवन, बदले में दे जा यौवनदेजा उस युग का मेरा मन, बदले में लेजा सब धनआजा ला दे कण-कण में अब फ़िर से ऐसा परिवर्तनमरता जहाँ आज यह जीवन वहाँ करे यौवन नर्तन
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