ग़ज़ल

मैं प्यासा भृंग जनम भर का

गोपाल सिंह नेपाली · सब कलाम देखें
मैं प्यासा भृंग जनम भर काफिर मेरी प्यास बुझाए क्या,दुनिया का प्यार रसम भर का ।मैं प्यासा भृंग जनम भर का ।।
चंदा का प्यार चकोरों तकतारों का लोचन कोरों तकपावस की प्रीति क्षणिक सीमितबादल से लेकर भँवरों तकमधु-ऋतु में हृदय लुटाऊँ तो,कलियों का प्यार कसम भर का ।मैं प्यासा भृंग जनम भर का ।।
महफ़िल में नज़रों की चोरीपनघट का ढंग सीनाज़ोरीगलियों में शीश झुकाऊँ तो,यह, दो घूँटों की कमज़ोरीठुमरी ठुमके या ग़ज़ल छिड़े,कोठे का प्यार रकम भर का ।मैं प्यासा भृंग जनम भर का ।।
जाहिर में प्रीति भटकती हैपरदे की प्रीति खटकती हैनयनों में रूप बसाओ तोनियमों पर बात अटकती हैनियमों का आँचल पकड़ूँ तो,घूँघट का प्यार शरम भर का ।मैं प्यासा भृंग जनम भर का ।।
जीवन से है आदर्श बड़ापर दुनिया में अपकर्ष बड़ादो दिन जीने के लिए यहाँकरना पड़ता संघर्ष बड़ासंन्यासी बनकर विचरूँ तोसंतों का प्यार दिल भर का ।मैं प्यासा भृंग जनम भर का ।।
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