ग़ज़ल

पीरी परि देह छीनी

घनानंद · सब कलाम देखें
पीरी परी देह छीनी, राजत सनेह भीनी,:कीनी है अनंग अंग-अंग रंग बोरी सी ।नैन पिचकारी ज्यों चल्यौई करै रैन-दिन,:बगराए बारन फिरत झकझोरी सी ॥कहाँ लौं बखानों ’घनआनँद’ दुहेली दसा,:फाग मयी भी जान प्यारी वह भोरी सी ।तिहारे निहारे बिन, प्रानन करत होरा,:विरह अँगारन मगरि हिय होरी सी ॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.