ग़ज़ल
पिय के अनुराग सुहाग भरी
पिय के अनुराग सुहाग भरी, रति हेरौ न पावत रूप रफै ।रिझवारि महा रसरासि खिलार, सुगावत गारि बजाय डफै ॥अति ही सुकुमार उरोजन भार, भर मधुरी ड्ग, लंक लफै ।लपटै ’घनआनँद’ घायल ह्वैं, दग पागल छवै गुजरी गुलफै ॥
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