ग़ज़ल
तब तौ छबि पीवत जीवत है
तब तौ छबि पीवत जीवत है अब सोचन लोचन जात जरेहित-पोष के तोष सुप्राण पले बिललात महादुख दोष भरे.‘घनआनन्द’ मीत सुजान बिना सबही सुखसाज समाज टरेतब हार पहाड़ से लागत है अब आनि के बीच पहार परे.
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh