ग़ज़ल
परकाजहि देह को धारि फिरौ
परकाजहि देह को धारि फिरौ परजन्य जथारथ ह्वै दरसौ।निधि-नीर सुधा के समान करौ सबही बिधि सज्जनता सरसौ।घनआनँद जीवन दायक हौ कछू मेरियौ पीर हियें परसौ।कबहूँ वा बिसासी सुजान के आँगन मो अँसुवानहिं लै बरसौ॥
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