ग़ज़ल
जाके लिए घर आई घिघाय
जाके लिए घर आई घिघाय, करी मनुहारि उती तुम गाढ़ीआजु लखैं उहिं जात उतै, न रही सुरत्यौ उर यौं रति बाढ़ीता छिन तैं तिहिं भाँति अजौं, न हलै न चलै बिधि की लसी काढ़ीवाहि गँवा छिनु वाही गली तिनु, वैसैहीं चाह (बै) वैसेही ठाढ़ी ।।
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