ग़ज़ल

अभी इस तरफ़ न निगाह कर

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँमेरा लफ़्ज़-लफ़्ज़ हो आईना तुझे आईने में उतार लूँ
मैं तमाम दिन का थका हुआ, तू तमाम शब का जगा हुआज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर, तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ
अगर आसमाँ की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-क़याम होतो मैं मोतियों की दुकान से तेरी बालियाँ तेरे हार लूँ
कई अजनबी तेरी राह के मेरे पास से यूँ गुज़र गयेजिन्हें देख कर ये तड़प हुई तेरा नाम लेके पुकार लूँ
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh