ग़ज़ल

कोई काँटा चुभा नहीं होता

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
कोई काँटा चुभा नहीं होतादिल अगर फूल सा नहीं होता
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगीयूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
गुफ़्तगू उन से रोज़ होती हैमुद्दतों सामना नहीं होता
जी बहुत चाहता सच बोलेंक्या करें हौसला नहीं होता
रात का इंतज़ार कौन करेआज कल दिन में क्या नहीं होता
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