ग़ज़ल
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न देकि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझेअब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे
हँसो आज इतना कि इस शोर मेंसदा सिसकियों की सुनाई न दे
अभी तो बदन में लहू है बहुतकलम छीन ले रोशनाई न दे
मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लोज़मीं आसमाँ कुछ दिखाई न दे
ग़ुलामी को बरकत समझने लगेंअसीरों को ऐसी रिहाई न दे
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिएजहाँ से मदीना दिखाई न दे
मैं अश्कों से नाम-ए-मुहम्मद लिखूँक़लम छीन ले रोशनाई न दे
ख़ुदा ऐसे इरफ़ान का नाम हैरहे सामने और दिखाई न दे
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