ग़ज़ल

कहीं चांद राहों में खो गया

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
कहीं चांद राहों में खो गया कहीं चांदनी भी भटक गईमैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई
मेरी दास्ताँ का उरूज था तेरी नर्म पलकों की छाँव मेंमेरे साथ था तुझे जागना तेरी आँख कैसे झपक गई
कभी हम मिले तो भी क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासलेन कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिझक गई
मुझे पदने वाला पढ़े भी क्या मुझे लिखने वाला लिखे भी क्याजहाँ नाम मेरा लिखा गया वहां रोशनाई उलट गई
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी क़ामयाब न हो सकींतेरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई
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