ग़ज़ल

ख़्वाब इन आँखों से अब कोई चुरा कर ले जाये

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
ख़्वाब इस आँखों से अब कोई चुरा कर ले जायेक़ब्र के सूखे हुये फूल उठा कर ले जाये
मुंतज़िर फूल में ख़ुश्बू की तरह हूँ कब सेकोई झोंकें की तरह आये उड़ा कर ले जाये
ये भी पानी है मगर आँखों का ऐसा पानीजो हथेली पे रची मेहंदी उड़ा कर ले जाये
मैं मोहब्बत से महकता हुआ ख़त हूँ मुझ कोज़िन्दगी अपनी किताबों में दबा कर ले जाये
ख़ाक इंसाफ़ है नाबीना बुतों के आगेरात थाली में चिराग़ों को सजा कर ले जाये
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