ग़ज़ल

आ चांदनी भी मेरी तरह जाग रही है

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
आ चाँदनी भी मेरी तरह जाग रही हैपलकों पे सितारों को लिये रात खड़ी है
ये बात कि सूरत के भले दिल के बुरे होंअल्लाह करे झूठ हो बहुतों से सुनी है
वो माथे का मतला हो कि होंठों के दो मिसरेबचपन की ग़ज़ल ही मेरी महबूब रही है
ग़ज़लों ने वहीं ज़ुल्फ़ों के फैला दिये सायेजिन राहों पे देखा है बहुत धूप कड़ी है
हम दिल्ली भी हो आये हैं लाहौर भी घूमेऐ यार मगर तेरी गली तेरी गली है
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