ग़ज़ल
कोई न जान सका वो कहाँ से आया था
कोई न जान सका वो कहाँ से आया थाऔर उसने धूूप से बादल को क्यों मिलाया था
यह बात लोगों को शायद पसंद आयी नहींमकान छोटा था लेकिन बहुत सजाया था
वो अब वहाँ हैं जहाँ रास्ते नहीं जातेमैं जिसके साथ यहाँ पिछले साल आया था
सुना है उस पे चहकने लगे परिंदे भीवो एक पौधा जो हमने कभी लगाया था
चिराग़ डूब गए कपकपाये होंठों परकिसी का हाथ हमारे लबों तक आया था
तमाम उम्र मेरा दम इसी धुएं में घुटावो एक चिराग़ था मैंने उसे बुझाया था
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