ग़ज़ल
दूसरों को हमारी सज़ायें न दे
दूसरों को हमारी सज़ायें न देचांदनी रात को बद-दुआयें न दे
फूल से आशिक़ी का हुनर सीख लेतितलियाँ ख़ुद रुकेंगी सदायें न दे
सब गुनाहों का इक़रार करने लगेंइस क़दर ख़ुबसूरत सज़ायें न दे
मोतियों को छुपा सीपियों की तरहबेवफ़ाओं को अपनी वफ़ायें न दे
मैं बिखर जाऊँगा आँसूओं की तरहइस क़दर प्यार से बद-दुआयें न दे
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