ग़ज़ल

दूसरों को हमारी सज़ायें न दे

बशीर बद्र · सब कलाम देखें
दूसरों को हमारी सज़ायें न देचांदनी रात को बद-दुआयें न दे
फूल से आशिक़ी का हुनर सीख लेतितलियाँ ख़ुद रुकेंगी सदायें न दे
सब गुनाहों का इक़रार करने लगेंइस क़दर ख़ुबसूरत सज़ायें न दे
मोतियों को छुपा सीपियों की तरहबेवफ़ाओं को अपनी वफ़ायें न दे
मैं बिखर जाऊँगा आँसूओं की तरहइस क़दर प्यार से बद-दुआयें न दे
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh