ग़ज़ल
आँसुओं की जहाँ पायमाली रही
आँसुओं की जहाँ पायमाली रहीऐसी बस्ती चराग़ों से ख़ाली रही
दुश्मनों की तरह उस से लड़ते रहेअपनी चाहत भी कितनी निराली रही
जब कभी भी तुम्हारा ख़याल आ गयाफिर कई रोज़ तक बेख़याली रही
लब तरसते रहे इक हँसी के लियेमेरी कश्ती मुसाफ़िर से ख़ाली रही
चाँद तारे सभी हम-सफ़र थे मगरज़िन्दगी रात थी रात काली रही
मेरे सीने पे ख़ुशबू ने सर रख दियामेरी बाँहों में फूलों की डाली रही
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